Herpes Genitalis

हरपिस – एक क्लेशकारक व्याधि

डॉ. ए. कुमार, मुंबई के सुप्रसिद्ध गुप्तरोग चिकित्सक है | वे कायाकल्प इंटरनॅशनल सेक्स & हेल्थ क्लिनिक्स, मुंबई के प्रमुख इंचार्ज हैं | एक बेहद कामियाब सेक्शोलॉजिस्ट होने के साथ-साथ डॉ. ए. कुमार प्री & पोस्ट मॅरेज काउनसेलर भी है | समाज में यौन-शिक्षा के प्रचार हेतु उनके ध्वारा लिखित लेख प्रस्तुत हैं |

डॉक्टर साहब चार महिने पहले मैं ग्रॅजुयेट हुआ और इस खुशी में मैंने अपने दोस्तोदोस्तों को एक पार्टी दी | पार्टी मे शराब थोड़ी ज़्यादा ही हो गयी थी और नशे की हालत में दोस्तों के बहकावे में आकर मैने मेरे ग़ैरसंगत दोस्तों के साथ बाहर जाकर समागम किया | उसके एक महिने बाद मेरे इंद्रिय पर राई के आकार की छोटी छोटी पानी से भारी हुई फुंसियाँ आ गयी | उस जगह पर बहुत जलन और वेदना थी | चार-पाँच दिन में वो फुंसियाँ फूट गयी और ठीक हो गयी | पर अभी 19-20 दिन के बाद फिर उसी तरह की फुंसिया आ गयी हैं | मैं किसी गुप्तरोग से तो संक्रमित नहीं हो गया हूँ ? इस शंका से मैं बेचैन हूँ | आप मेरी चिकित्सा करके मुझे ठीक कर दीजिए | आपका बहुत एहसान होगा |

मेरे क्लिनिक में एक 23-25 वर्षीय युवक मुझसे विनंती कर रहा था उसके चेहरे पर डर और पश्चयाताप स्पष्ट दिखाई दे रहा था | एक गुप्तरोगतग्य के पास ऐसा इतिहास बतानेवाले या ऐसा दिखनेवाले अनेक रुग्ण, आते हें| और उनकी संपूर्ण जाँच हो जाने के बाद वे हरपिस नामक यौन संक्रामक व्याधि से संक्रमित पाए जाते है |

आज आधुनिकता की ओर बढ़नेवाले समाज मे सांस्कृतिक नैतिकता और सभ्यतावाली अपनी भारतीय संस्कृति छोड़ के तरुणवर्ग पाश्चात्य संस्कृति पसंद करता है | इसके अलावा वर्तमानपत्र, मासिक, टी. व्ही. और सिनेमा आदि माध्यमों ध्वारा वस्त्रविहिन महिलाओं की तस्वीरें, लैंगिक संबंधो का भड़क चित्रण, कामुक संवाद व असभ्य चाल ढ़ाल से लैंगिकता का विकृत चित्रण दिखाया जाता है | इसके परिणाम स्वरूप कामोत्तेजित युवकों ध्वारा वेश्यागमन या परस्त्री के साथ संबंध बनाया जाता है और इससे ही उपदंश, गोनोरिया, सिफलिस, एड्स, हरपिस आदि गुप्तरोगों का प्रसार होता है |

हरपिस एक ऐसा ही अत्यधिक प्रमाण में दिखाई देनेवाला यौन संक्रमित गुप्तरोग है और इसका कारण विशिष्ट प्रकार के वायरस हें | समागम के दिन के बाद से लेकर छै महिने तक ये कभी भी हो सकता है | व्याधिलक्षण दिखाई देने के एक दिन पहले इंद्रिय पर सूजन और खुजली होती है | इसके बाद इंद्रिय पर द्राक्ष के गुच्छो के समान, सरसों या शक्कर के दाने के समान पानी जैसे द्रव से भरी छोटी छोटी फुंसियाँ आती हैं | किसी भी प्रकार की दवा ना लेने पर भी वे अपने आप सूख जाती हैं या पकती हैं व फूटकर ठीक हो जाती है | पर बाद में 19-20 दिन के बाद फिर से फुंसियाँ आ जाती हैं, जख्म बन जाता है और यह दुष्टचक्र बार बार चलता रहता है | व्रणस्थान पर दाह और वेदना रहती है | रुग्ण बेचैन हो जाता है | अर्वाचीन शास्त्र के अनुसार हरपिस सिंपलेक्स और हरपिस झोस्टर ऐसे इसके दो प्रकार बताएं गए हैं | हरपिस सिंपलेक्स HSV-I और HSV-II ऐसे सांकेतिक और संक्षिप्त नाम से पहचाने जानेवाले विषाणु से होती है | इसमे से HSV-II का प्रादुर्भाव पुरुषों मेमें इंद्रिय तथा स्त्रियों मे योनि और योनिमुख के आसपास होता है, तो HSV का संक्रमण होंठ, नाक, मुख इ. जगह पर हो सकता है | किसी भी तरह के मानसिक तनाव, बुखार, न्यूमोनिया, दुर्बलता, कमज़ोरी आदि से हरपिस का दौरा बार बार होता है | और एक बार व्याधि हो जाने के बाद लंबे समय तक रुग्ण को शारीरिक और मानसिक दु:ख देता है | लेकिन आयुर्वेद में इस व्याधि का विस्तृत उल्लेख मिलता है | ये व्याधि बहुत जल्दगतिसे फैलती है इसलिए इसे विसर्प और आम भाषा में नागिन भी कहा जाता है | आयुर्वेद के अनुसार यह बीमारी रक्तदोष की विकृति से होती है | पित्तकारक आहारविहार का अत्याधिक सेवन, तीखा, मसालेदार व तेल युक्त आहार का अत्याधिक सेवन, मटन-मछी जैसे तामसी आहार का सेवन, धूप में ज़्यादा घूमना, अत्याधिक शारीरिक श्रम, उष्ण वातावरण, भट्टी के पास, बोयलर, बेकरी इ. स्थानों पर अग्नि के सतत संपर्क में रहनेवाले व्यक्तियों को हरपिस की बीमारी ज़्यादा होती है |

चंद्रकला रस जैसी रक्तशुद्धिकारक औषध, चंद्रप्रभा रस, दुर्वादि धृत इ. पित्तशामक औषध, जात्यादि तेल, दशांग लेप, शतधौत धृत इ. का स्थानिक लेपनार्थ इस्तेमाल किया जाता है | इससे दाहशमन और व्रणरोपण ये दोनो कर्म हो जाते है | मानसिक तनाव, अत्याधिक उष्ण वातावरण या धूप मे काम न करे, अति तैलीय, मसालेदार व, तीखा खाना, मतन-मछी, मदिरा, धुम्रपान का अत्याधिक सेवन न करें | वेश्यागमन या परस्त्री के साथ संबंध न रखें | पूर्वलक्षण दिखाई देने के बाद लैंगिक संबंध न बनाएे अन्यथा आपके साथी को भी ये बीमारी हो सकती है |

इस प्रकार आयुर्वेदिक चिकित्सा और पाठ्यापथ का पालन करने से यह बीमारी काफी हद तक काबू में रहती है | इससे हरपिस के बार बार होनेवाले आक्रमण कम होते हैं और व्यक्ति अपने कुटुंब के साथ सुखी और समाधानी वैवाहिक जीवन बिता सकता है |